कुछ बात है जो मुझे समझ आयी
ये हाथों की लकीरें हैं जिन्दगी की परछाई नहीं
बिल्ली का रास्ता पार करना इसमें कोई बुराई नहीं
सभी जाति धर्म साथ बैठें ऐसी कोई चारपाई नहीं
हर मंदिर में मत्था टेकना ही पुण्य की कमाई नहीं
संसार में बुरी संगति से गहरी कोई खाईं नहीं
कल्पना से ऊँची कोई ऊंचाई नहीं
रोशनी कभी अँधेरे में समाई नहीं
लोहे की जंजीरों से मजबूत कोई कलाई नहीं
रोज नहा लेने में दिल की सफाई नहीं
सबसे सुन्दर स्त्री ईश्वर ने कभी बनाई ही नहीं
समय से ज्यादा कोई गतिमान और चिरस्थाई नहीं
ये तो बस चादर की सिलवटें हैं रुसवाई नहीं
भावनाओ से गम्भीर शब्दों की गहराई नहीं
एक मुस्कुराती तस्वीर ही टूटे दिल की सच्चाई नहीं..!!
- वीरेन्द्र प्रताप सिंह
ये हाथों की लकीरें हैं जिन्दगी की परछाई नहीं
बिल्ली का रास्ता पार करना इसमें कोई बुराई नहीं
सभी जाति धर्म साथ बैठें ऐसी कोई चारपाई नहीं
हर मंदिर में मत्था टेकना ही पुण्य की कमाई नहीं
संसार में बुरी संगति से गहरी कोई खाईं नहीं
कल्पना से ऊँची कोई ऊंचाई नहीं
रोशनी कभी अँधेरे में समाई नहीं
लोहे की जंजीरों से मजबूत कोई कलाई नहीं
रोज नहा लेने में दिल की सफाई नहीं
सबसे सुन्दर स्त्री ईश्वर ने कभी बनाई ही नहीं
समय से ज्यादा कोई गतिमान और चिरस्थाई नहीं
ये तो बस चादर की सिलवटें हैं रुसवाई नहीं
भावनाओ से गम्भीर शब्दों की गहराई नहीं
एक मुस्कुराती तस्वीर ही टूटे दिल की सच्चाई नहीं..!!
- वीरेन्द्र प्रताप सिंह
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