हम जीते रहे दूसरों को जीता देखकर,
खुद की भी कोई जिंदगी हो सकती है,
ऐसा कभी सोचा ही नहीं..
हम चौकते रहे दूसरों के जज्बे को देखकर,
पर ऐसा जज्बा हो सकता है खुद में भी,
ऐसा कभी सोचा ही नहीं..
हमने मुस्करा कर जीने को ही जिंदगी समझा,
हंसकर जीने के बारे में,
कभी सोचा ही नहीं..
यूँ सोचते हैं हम हमेशा कुछ न कुछ,
पर क्या और क्यों सोचते है,
शायद, इस बारे में कभी सोचा ही नहीं..!!
- वीरेन्द्र प्रताप सिंह
- वीरेन्द्र प्रताप सिंह