बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

एक सवाल.. कितना विशाल..

जब भी कभी एक सवाल का ख्याल आता है
ह्रदय में अजीब भूचाल सा आता है 
विचारों का गहरा मंथन होता है 
तर्कों के तीर सभी दिशा में चलते हैं 
और एक अन्तरिक्ष से जा मिलते हैं 

फिर एक प्रश्न और आता है 
कितना विशाल है मेरा मन ?
जो अपने विचारों से अन्तरिक्ष भर सकता है 
क्या सभी के पास ऐसी ही विचारशीलता है ?
क्या मै उस विशाल शून्य का एक भाग ही हूँ ?
आज अन्नत की परिभाषा की पुष्टि हो गयी 

पर प्रश्न का जवाब न मिला था मुझे अभी 
उसका जवाब तो इस पूरे विचारों के विशाल अन्तरिक्ष में है 
जिसका एक अंश ही हर इंसान के पास है 
मै बस एक हूँ, अकेला हूँ, असमर्थ हूँ..!!


- वीरेन्द्र प्रताप सिंह