गुरुवार, 1 जनवरी 2015

यूँ-ही

इतना आसां कहाँ आपकी तारीफ़ करना
लफ़्ज़ नही मिले..हम तलाशते रह गए..!!

बुधवार, 12 जून 2013

आम इन्सान ..

कुछ दिन खुश रहता है आम इन्सान 
कुछ दिन चुप रहता है आम इन्सान 
कुछ दिन दुःख सहता है आम इन्सान 
कुछ दिन विरोध करता है आम इन्सान 
कुछ दिन को थक जाता है आम इन्सान 
कुछ दिन के लिए उग्र हो जाता है आम इन्सान 
कुछ दिन सम्मान पाता है आम इन्सान 
कुछ दिन राज करता है आम इन्सान 
फिर से कुछ दिन खुश-चुप-दुःख ...है आम इन्सान 
.
ये Mango Man नहीं है आम इन्सान 
पर चुनाव में मौसम में देख-रेख होती है इसकी 
और चुनाव आने पर ख़रीदा जाता है 
फिर कोल्ड स्टोरेज में रखकर सत्ता में स्वाद लिया जाता है 
.
वास्तव में जीवन में सदैव संघर्ष करने वाला है आम इन्सान..!!


- वीरेन्द्र प्रताप सिंह

शनिवार, 11 मई 2013

छोटी समझ...

कुछ बात है जो मुझे समझ आयी
ये हाथों की लकीरें हैं जिन्दगी की परछाई नहीं
बिल्ली का रास्ता पार करना इसमें कोई बुराई नहीं
सभी जाति धर्म साथ बैठें ऐसी कोई चारपाई नहीं
हर मंदिर में मत्था टेकना ही पुण्य की कमाई नहीं
संसार में बुरी संगति से गहरी कोई खाईं  नहीं
कल्पना से ऊँची कोई ऊंचाई नहीं
रोशनी कभी अँधेरे में समाई नहीं
लोहे की जंजीरों से मजबूत कोई कलाई नहीं
रोज नहा लेने में दिल की सफाई नहीं
सबसे सुन्दर स्त्री ईश्वर ने कभी बनाई ही नहीं
समय से ज्यादा कोई गतिमान और चिरस्थाई नहीं
ये तो बस चादर की सिलवटें हैं रुसवाई नहीं
भावनाओ से गम्भीर शब्दों की गहराई नहीं
एक मुस्कुराती तस्वीर ही टूटे दिल की सच्चाई नहीं..!!

- वीरेन्द्र प्रताप सिंह

रविवार, 28 अप्रैल 2013

ये जो ख़ामोशी है ..

ख़ामोशी कौन है?
कभी पूछों उससे
वो कैसे बताएगी ?
राज़ सारे अपने साये में छिपाएगी
उसकी आवाज में चींख है पर वो सुनाई न देगी
इक गहरी सोच है वो जो दिखाई न देगी
कभी ख़ुशी में आखों से आती है ख़ामोशी
कभी दर्द में मुस्करा जाती है ख़ामोशी
चुप रहकर सबकुछ सुनती है ख़ामोशी
चुप रहकर ही सबको सुनाती है ख़ामोशी
हर अबूझ सवाल का जवाब है ख़ामोशी
हर अनजान की पहचान है ये ख़ामोशी
बंद आखों की रौशनी है ख़ामोशी
ठंडी हवा का रोमांच है ख़ामोशी
दिलासे का स्पर्श है ख़ामोशी
हर इन्सान का कर्ज है ख़ामोशी
आज ईमान का फर्ज है ख़ामोशी
माँ की दुआ है ख़ामोशी
पिता का दर्द है ख़ामोशी
तेरे मेरे रिश्ते का नाम है ख़ामोशी
मेरी जिन्दगी का ईनाम है ख़ामोशी..!!

- वीरेन्द्र प्रताप सिंह

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013

एक सवाल.. कितना विशाल..

जब भी कभी एक सवाल का ख्याल आता है
ह्रदय में अजीब भूचाल सा आता है 
विचारों का गहरा मंथन होता है 
तर्कों के तीर सभी दिशा में चलते हैं 
और एक अन्तरिक्ष से जा मिलते हैं 

फिर एक प्रश्न और आता है 
कितना विशाल है मेरा मन ?
जो अपने विचारों से अन्तरिक्ष भर सकता है 
क्या सभी के पास ऐसी ही विचारशीलता है ?
क्या मै उस विशाल शून्य का एक भाग ही हूँ ?
आज अन्नत की परिभाषा की पुष्टि हो गयी 

पर प्रश्न का जवाब न मिला था मुझे अभी 
उसका जवाब तो इस पूरे विचारों के विशाल अन्तरिक्ष में है 
जिसका एक अंश ही हर इंसान के पास है 
मै बस एक हूँ, अकेला हूँ, असमर्थ हूँ..!!


- वीरेन्द्र प्रताप सिंह

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

कभी सोचा ही नहीं..


हम जीते रहे दूसरों को जीता देखकर,
खुद की भी कोई जिंदगी हो सकती है,
ऐसा कभी सोचा ही नहीं..

हम चौकते रहे दूसरों के जज्बे को देखकर,
पर ऐसा जज्बा हो सकता है खुद में भी,
ऐसा कभी सोचा ही नहीं..

हमने मुस्करा कर जीने को ही जिंदगी समझा,
हंसकर जीने के बारे में,
कभी सोचा ही नहीं..

यूँ सोचते हैं हम हमेशा कुछ कुछ,
पर क्या और क्यों सोचते है,
शायद, इस बारे में कभी सोचा ही नहीं..!!

- वीरेन्द्र प्रताप सिंह